गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

मैं झूठा हूँ, और खुश हूँ

मैं खुश नहीं हूँ
वजहें काफी हो सकती है खुश रहने की

एक बूढी हो चुकी किताब पे जिल्द लगाने से
मुझे मिलनी चाहिए ख़ुशी
पर इस किताब के फटते पन्नों को देख दुःख नही होता
शायद मैंने पतंगे बहुत काटी है
पतंगों की डोर से
पतंगे बनायीं भी बहुत है
किताबे फाड़ के

खुश रहने के लिए बहुत झूठ बोलना चाहता हूँ
पर सच्चाई हर पल गर्भवती हो जाती है
सच्चाई के पेट पे लात मारने के लिए हिम्मत चुराई जाती होगी कहीं
पर मैं चोर नहीं, मैं हत्यारा नहीं
हाँ पर मैं झूठा हूँ
और मैं खुश हूँ

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