रविवार, 25 अगस्त 2013

दूरी

तुमसे कहीं बहुत दूर 
किसी गुमनाम बस्ती में 
बुन रहा हूँ पलकों से 
तुमसे मिलने के सपने 
भेज रहा हूँ आसमान में 
प्रेमपत्रों को बना के पतंग 
इस उम्मीद में की 
जब कटेगी पतंग 
तो गिरेगी तुम्हारे छत पर 
और तुम्हे दिख जायेगा मेरा चेहरा सन्देश में 
मालूम हो जायेगा की मैं तुम्हे याद करता हूँ परदेस में
यकीं हो जायेगा तुम्हे की दूर हो जाने के बाद भी
प्रेम की लौ निरंतर जलती रहती है ह्रदय में
तमाम तुफानो बवंडरो को धता बताते हुए

अराहान

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