मंगलवार, 27 अगस्त 2013

लुक्का छिप्पी



रात के झीनी चादर तले , एकांत के पर्दों  के बीच, मैं जब तुम्हारे बारे में सोचता हूँ तो आस पास चमकने लगते हैं,  तुम्हारे साथ बीताये गए सुनहरे पलों के जुगनू। मैं हाथ बढ़ा कर उन्हें पकड़ने की कोशिश करता हूँ  पर हर बार की तरह मेरी मुट्ठी में जलता हुआ खालीपन ही हाथ आता है जिसकी तपिश  से मैं हर बार जल जाता हूँ. तुमसे बिछड़ने के वक़्त, जब मैं अपनी हथेलियों में तुम्हारे आँखों से झर रहे मोतियों को इक्कट्ठा कर रहा था, तब तुमने कहा था की मुझसे दूर हो जाने के बाद तुम चाँद से एक धागा लटकाओगी और मुझे खिंच लोगी। मैं रोज चाँद की तरफ एक छोटे बच्चे की तरह देखता हूँ की कोई धागा गिरेगा चाँद से।  पर अब तक चाँद से कोई धागा नहीं लटका पर हाँ चाँद से हर रोज खून टपकता है, तुम्हारे कसमों का खून, तुम्हारे किये गए वादों का खून।  तुम तो कहा करती थी की जब भी मैं तुम्हे याद करूँगा तुम सब कुछ भूल कर जहाँ भी होगी दौड़ी चली आओगी। मैं हर पल हर वक़्त तुम्हे याद करता हूँ पर तुम नहीं आती।  मुझे पता है की तुम दुनिया के किस ना किसी कोने से मुझे जरूर देखा करती होगी, मेरी खामोशियाँ सुना करती होगी। अगर ऐसा है तो तुम क्यूँ मेरे सामने नहीं आती, क्या तूम सचमुच की परी बन गयी  हो, अगर ऐसा तो फिर आ जाओ ना, परियों के पास तो जादुई छड़ी होती है. अबकी बार मैं वादा करता हूँ, कभी तुम्हारे साथ लुक्का छिप्पी का खेल नहीं खेलूँगा, और फिर कभी तुम्हे खुद से बिछड़ने नहीं दूंगा।

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