शनिवार, 22 जून 2013

तेरी यादें



पीले पत्तों जैसी किसी उदास शाम को 
धुंध बन कर छा  जाती हैं आसमान में  तुम्हारी यादें 
साँसों में घुसपैठ करने लगता है 
तुम्हारी यादों का कड़वा धुंआ 
मैं पत्थर फेंककर आसमान में 
तितर-बितर करने की कोशिश करता हूँ 
बादलों में बने तुम्हारे अश्क को 
पर आसमान से दुबारा गिरता हुआ पत्थर 
मुझको ही चोट दे जाता है 
शायद उसको भी पसंद नहीं की 
मैं तुम्हे भूल जाऊं 

अरहान 

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