शनिवार, 22 जून 2013

एक शाम




एक शाम 
जब दिन ले रही थी उबासी 
और रात कर रही थी जागने की तैयारी 
परिंदे लौट रहे थे घर को 
चुने हुए दानों के साथ 
पनिहारिनों की टोली लौट रही थी हाथों में मटके लिए 
पूर्व हवा के झोकों के बीच सूरज ले रहा था झपकी 
वो शाम लौट आने की शाम थी 
सब कोई लौट रहे थे वापस अपने घर को 
पर मुझे जाना था
तुमसे दूर 
तुम्हे अकेला छोड़कर, अपनी कविताओं के हवाले 
अपनी कसमों के बीच, हिफाजत से छोड़कर 
लौट आने के दिनों का वास्ता देकर 
मुझे जाना था 
एक ऐसे ही किसी शाम को 
तुमसे दूर 
दाने की तलाश में 

अरहान 

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