शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2012

सृजन


मुझे नहीं पता है भौतिकी के सिद्धांतो के बारे में 
ना ही मुझे विज्ञान की थोड़ी सी भी समझ है 
ना ही मैं न्यूटन हूँ 
ना ही आइंस्टीन फिर
पर फिर भी  मैं 
अपने छोटे से तंग अँधेरे कमरे में 
तुम्हारे जुल्फों से रात बना सकता हूँ 
तुम्हारे चेहरे से चाँद बना सकता हूँ 
तुम्हारी बड़ी बड़ी आँखों से 
टिमटिमाते सितारे बना सकता हूँ 
तुम्हारे सुर्ख गुलाबी होठों से 
फूल बना सकता हूँ 
है मुझमे इतनी काबिलियत की मैं तुम्हारे स्पर्श से 
एक नया संसार बना सकता हूँ 

ब्रजेश कुमार सिंह "अराहान" 




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