शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

एक गजल



दूर आसमान में जंवा हो रहा एक चाँद
इधर जिंदगी का सूरज ढलता जा रहा है

कोई इत्तेलाह उन्हें भी कर दे की 
उनको पाने का ख्वाब दिल में पलता जा रहा है

हम इसी फिराक में हैं की शाम ढलने से पहले घर को जाएँ
इधर वक्त का पहिया बढ़ता ही जा रहा है

खुद को बनाने की कोशिश है कैसी
जो सबकुछ अपना बिगडता जा रहा है

हम अपनी बात उसे बताएं कैसे
वो अपनी ही कहानी कहता जा रहा है

उसको पुकार रहें हैं हम कितनी देर से
 वो है की अपनी धुन में चलता जा रहा है

ऊपर आसमान बाहें फैलाये खडा है
पंक्षी पिंजड़े में तडपता जा रहा है

कोई खोल क्यूँ नहीं देता ये पिंजडा
पंक्षी के दिल में बगावत का शोला भडकता  जा रहा है

अब नहीं याद आते है दादी नानी के किस्से
जवानी की दहलीज में बचपन बिछड़ता ही  जा रहा है

ढल जायेगा सूरज यूँ ही, रास्ता दिखा दे उसे अरहान
मंजिल की तलाश में मुसफोर भटकता ही जा रहा है

ब्रजेश कुमार सिंह "अराहान'


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