सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

मैंने कवितायेँ नहीं चुराईं

मैंने कवितायें नहीं चुराई है 
मैंने तो किसी का दर्द चुराया है 
एक बेसुरे दर्द को 
छंदों में सजाया है 
मैंने कवितायें नहीं चुराई है 
मैंने तो किसी का दर्द चुराया है 
बूँद बूँद गिरते आंसुओं को 
कागज़ पे उगाया है 
उभर आती है जो माथे पर परेशानियों की शिकन 
मैंने इसे शब्दों  के जंगल में छिपाया है 
गुमनामी की दलदल में दबी थी कुछ आवाजें 
मैंने इन आवाजों को एक गीत में गुनगुनाया है 
मैंने कवितायें नहीं चुरायी 
मैंने तो किसी का दर्द चुराया है 
दुनिया भर की मुश्किलों को 
अपने सीने से लगाया है 
मैंने कवितायेँ नहीं चुराईं मैंने तो 
किसी का दर्द चुराया है

ब्रजेश सिंह

ब्रजेश  सिंह 'अराहान'

2 टिप्‍पणियां:

vimal ने कहा…

badhiya....keep it up...

Arahan ने कहा…

@vimal Thanks