सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

बड़ी मुश्किलें है इस जमाने में

बड़ी मुश्किलें है इस जमाने में 
अरसों लग जाते हैं कुछ पाने में 
हम तो यूँ ही खुद को लुटा बैठे 
लोग कहते हैं कुछ बचा नहीं इस दीवाने में 

फूल खिलतें थे कभी हमारे भी आशियाने में 
शख्शियत थी हमारी भी किसी ज़माने में 
हमदर्द थी दुनिया भी हमारी तब 
आज कतराते है लोग हमारे पास आने में 

देर होने लगी थी अब उनके भी आने में 
इंतज़ार फिर भी कर लेते थे हम जाने अनजाने में 
उन्होंने अपनी वफ़ा का ऐसा सुबूत दिया 
अफ़सोस होता है हमें उनको भी आजमाने में 

सुकून मिलता है हमें अब खुद को छिपाने में 
खुशियाँ ढूंढता हूँ अब अफ़साने में 
खामोशी में  जीना सिख लिया है हमने 
महफिले सजती है अब वीराने में 

ज़िन्दगी बस्ती है अब मयखाने में 
कुछ मदद मिलता है यहाँ सबकुछ भुलाने में 
बुला ले ऐ खुदा मुझे अपने पास 
अब तू भी दिल न लगा मुझे तड़पाने में 

बदल गयी है तेरी दुनिया ओ उपरवाले 
सबकी ख़ुशी है अब कुछ ना कुछ पाने में 
आज हम भी खुश होते 
अगर कल खुश न होते 'लुटाने' में 

मौत जी लेते हैं हम ज़िन्दगी के बहाने में 
एक दर्द ही है जो साथ है हर पल 
दिल्लगी नहीं किसी की हमारे पास आने में 
अब तो बस धडकनों के थमने का इंतज़ार  है ऐ खुदा 
क्यूंकि बड़ी मुश्किलें है तेरे इस जमाने में 

ब्रजेश सिंह

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