शनिवार, 20 दिसंबर 2014

नौकरी

नवम्बर की उस आवारा शाम को लड़का रोज की तरह पार्क की बेंच पर बैठा था,उस लड़की की इंतजार में, जिस से वो प्यार करता था।दिन भर इधर उधर दफ्तर दर दफ्तर डिग्रीयों की फ़ाइल लेकर मारा मारा फिरने के बाउजूद भी उसे नौकरी नहीं मिली थी। वो रोज शाम की तरह इस शाम को भी पार्क की उस बेंच पर वो उस लड़की का इन्तजार कर रहा था जिसके गोद में सर रखकर वो रोज की कहानी बताता था और अपने आँखों क3 आंसू बहने से पहले ही उसके दुपट्टे में पोंछ लेता था। उस दिन काफी देर हो गयी थी लड़की के आने में। लड़का बेचैनी में पार्क के उस बेंच पर अपना और उस लड़की का नाम उकेर रहा था। तभी दूर से उसे कोई आता हुआ दिखाई दिया, शाम के धुंध में उसे कुछ भी साफ़ नहीं दिखा रहा था। जब वो धुंधली तस्वीर उसके करीब आई तो उसे एक छोटे से बच्चे का चेहरा नजर आया। बच्चा जब सामने आया तब उसने हाथ से एक पैकेट निकाल कर उस लड़के को दिया और तुरंत ही शाम की धुंध में गायब हो गया। लड़के एक पल के लिए चौंक गया फिर उसने अनमने ढंग से उस पैकेट को खोला। पैकेट में कुछ कागज़ लिफाफे थे। जब उसने पहला लिफाफा खोला तो उसमे किसी कंपनी का को दस्तावेज नजर आये। पूरा पढ़ने पर उसे पता चला की वो तो उसी कंपनी का कॉल लेटर था जिस कंपनी में नौकरी के लिए वो आज सुबह सुबह गया था। लड़का बहुत खुश हुआ, उसकी सारी चिंताए दूर हो गयी थी। वो मन ही मन खुश हो रहा था की नौकरी मिलने की खबर सबसे पहले वो उस लड़की को देगा। लड़का इतना खुश था की ख़ुशी में उसने दुसरा लिफाफा नहीं खोला। कुछ देर बाद जब उसके आँखों से सुनहरे भविष्य की धुप हटी तब उसने दूसरा लिफाफा खोला। ये कोई शादी का कार्ड था। पूरी तरह से कार्ड पढ़ने पर वो स्तब्ध रह गया। उसकी आँखों से आंसू धीरे धीरे रास्ता ढूंढते ढूंढते निकलने लगे। लड़के को उस समय लड़की के दुपट्टे की बहुत ज्यादा जरुरत महसूस हुई। पर उस समय लड़की उसके पास न आ पायी। शाम के उस धुंध में लड़के को एक और अक्स नजर आया। मानो वो अक्स दूर से उस लड़के को देख रहा हो पर पास नाही आ रहा। लड़का पार्क की बेंच से उठकर उस अक्स के करीब जाने लगा पर वो जितना उस परछाई के पीछे जाता परछाई उतने ही दूर जाती रही। और एक समय के बाद परछाई नवंबर की उस धुंधली शाम में न जाने कहाँ खो गयी।

अगले महीने की पहली तारीख लड़के की जिंदगी की एक महत्वपूर्ण तारीख थी। वो दिन लड़के की नौकरी का पहला दिन था और उसी दिन लड़की की शादी उसके कंपनी के मालिक, उसके बॉस से हो रही थी।

घर वापसी

वो गली जिसे भुतहा समझकर लोगो ने अनदेखा कर दिया है कभी उस गली में जाना, वहाँ 11वी क्लास एक लड़का जस का तस बैठा मिलेगा क्लास की पिछली बेंच पर एक लड़की को टुकुर टुकुर ताकते हुए, मुट्ठियों में कागज़ के टुकड़े को भींचे हुए। उस लड़की की शकल तुमसे कितनी मिलती है ये सोच कर तुम चौंकना मत।

वो शहर के आखिरी छोर पे जो एक खंडहर है न कभी तुम उसमे जाना, वहाँ तुम्हे वही लड़का मिलेगा सड़क पर अपनी सायकिल की चेन लगाते हुए, सड़क के उस छोर पर अपने पापा के स्कूटर पर बैठी वो लड़की भी तुमको मिलेगी, उसे कहना लड़का शराब पीने से कभी नहीं मरेगा।

वो जो मेरे घर के पीछे वो रेलवे का यार्ड है न तुम उसमे जाना, वहाँ तुम्हे वही लड़का दिखेगा उसी लड़की के साथ, एक पूल के पर,तुम उनदोनो को बस इतना कहना की पूल से कूद जाना ही उन दोनों के लिए बेहतर है। पूल के दोनों तरफ इंसानों की बस्ती है, मुखौटे वालो इंसानो की बस्ती।

वो जो तुम्हारे घर के पिछवाड़े जो सुखा कुवां है न तुम उसमे झाँक के देखना वहाँ वो लड़का खड़ा है किसी स्टेशन पर, दुनिया से बहुत दूर जाने के लिए, किसी ट्रेन का इन्तजार कर रहा होगा, तुम उस लड़के को बस इतना कहना की वो लड़की उसका इंतजार कर रही है उसी पूल पर जहाँ उस से वो आखिरी बार मिली थी। सुनो तुम एक काम करना दोनों को पूल से धक्का दे देना। और लौट आना हमेशा के लिए मेरे पास उसी पूल के पास सालो पहले जहाँ से हमदोनो कूदे थे।

रविवार, 19 अक्तूबर 2014

तुम

तुम हो
किसी प्राचीन कालीन शिला पे
किसी अजीब भाषा में लिखे अभिलेख की तरह
जिसे मैं किसी पुरातत्त्ववेत्ता की तरह
समझने की कोशिश करता हूँ 
पर समझ नहीं पाता
मैं तुम्हे मैं रख देना चाहता हूँ
अपने ह्रदय के संग्रहालय में
हमेशा के लिए संभालकर
इस उम्मीद के साथ की
दिल की धड़कने बंद होने से पहले
मैं समझ जाउंगा तुम्हे

आईना

तुम्हारा दायीं तरफ एक बड़ा आईना है 
तुम्हारे बायीं तरफ भी उतना ही बड़ा आईना है 
मान लो तुम्हारे दायीं तरफ के आईने को मैं जिंदगी कहता हूँ 
और बायीं तरफ के आईने को मौत 
अब जरा करीब से देखो दोनों आईने में बारी बारी 
तुम कितनी दफा मरते हो
कितनी दफा जीते हो
जिंदगी नामक आईने में है मौत
मौत नामक आईने में है जिंदगी
और उन्दोनो आईनो में हो तुम खड़े बेवक़ूफ़ की तरह
जिंदगी और मौत को समझने की कोशिस करते हुए
एक भ्रम एक illusion में गहराई तक डूबते हुए

परिया

रात के दो बजे आवारा लड़का बैठा है छत की मुंडेर पर
रोज की तरह फिर से घर छोड़ देने की धमकी देकर
भूखे प्यासे आसमान को ताकते हुए
लड़का आसमान को ताककर
अपने मोबाइल पर गूगल करता है fairies 
जानना चाहता है की कैसी दिखती है परियां
लड़के के 2G मोबाइल पर गूगल सर्च कम्पलीट होने से पहले
बाजू वाले छत से कूद के आती है एक लड़की
हाथो में दो रोटी और सब्जी लिए
उस दिन लड़के को गूगल के सर्च रिजल्ट आने से पहले पता चल जाता है
की कैसी दिखती हैं परियां
परिया भी आम लड़कियों की तरह आती है दुपट्टे ओढकर
सोती रातो में सबसे नजरें बचाकर
बिना पंखो के उड़कर
परिया भूखे पेट सोती हैं
औरो को अपने हिस्से का खाना खिलाकर

कविता


जो तुम्हारे काजल से घुलकर बन गयी स्याही
और लिखने लगी विरह की एक अंतहीन कविता

मैंने यूँ तो चूमा है कई दफा तुम्हारे चेहरे को
पर अफ़सोस उस दिन न छु सके मेरे होठ तुम्हारे आँखों को
अगर उस दिन मैं तुम्हे चूमता तो
शायद मिटा देता अपने होठो से वो विरह की कविता
लिख देता तुम्हारे चेहरे पर मुस्कराहट

देखो ना मैं वक्त के उसी जाल में उलझा
अब तक लिख रहा हूँ कविता
बस जब कभी तुम्हे तुम्हारे चेहरे पर मुस्कराहट लिखा दिखाई दे
मुझे इत्तेलाह करना
मैं उस दिन तोड़ लूँगा अपनी कलम

ऐ चाँद सुन जरा



ओ बीती हुई रातो के बासी चाँद
ज़रा झाँक के देख जमीन पे
क्या उस पागल लड़की ने फिर से जला लिए है अपने हाथ
तारे गिनते हुए
या फिर से किसी टूटते तारे ने, 
तोड़ा है उसकी बंद आँखों में सजता कोई सपना
या फिर से कोई मतवाली हवा
उड़ा ले गयी है उसके सारे प्रेम पत्र
और वो ढूंढ रही है कागज़ के गीले टुकड़ो को
हाथो में जुगनू पकड़ कर
ओ जागती रातो के ऊबते पहरेदार
जरा नजरे फेर उसके घर की खिड़की पर
और बता
की क्या अब भी उसकी झील सी आँखें
नम होती है किसी के इन्तजार में
क्या अब भी दौड़ पड़ती है वो दरवाजे की तरफ
हलकी सी आहट पर
क्या अब भी भीगा भीगा सा होता है उसके दुपट्टे का कोना
क्या अब भी उसके आंसू रुस्वा कर जाते हैं उसके काजल को
ओ आसमान के सबसे फरेबी आशिक
जरा बता दे उस पागल लड़की को
की मैं प्रतिक्षण उसकी तरफ बढ़ रहा हूँ
माना हूँ मैं अब भी उस से सैकड़ों प्रकाश वर्ष दूर किसी और आकाशगंगा में
पर देखना एक दिन जरूर टूट की गिर पडूंगा उसके घर के अहाते में
किसी भटके हुए उल्कापिंड की तरह